मैं किसी धर्म विशेष पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाना चाहती, पर क्या करूँ इंसान हूँ और भगवान् ने सोचने की जो क्षमता मुझे दी है, तो कई बार दिमाग को उलझा देने वाले ख्याल आ ही जाते हैं| अपने परिवार के साथ जब अवसर मिला पवित्र पावन भूमि हरिद्धार के दर्शन करने को तो उत्सुकता से फूली नहीं समां रही थी आखिरकर माँ गंगा के दर्शन करने की किसको इच्छा नहीं होगी| अभी तक बस किताबों में ही पढ़ा था,और अब दर्शन करने का अवसर जो मिला था| हरिद्धार की धरती पर जाते ही बड़ी अच्छी अनुभति हुई| माँ गंगा का ठंडा जल स्पर्श करते ही शरीर में बिजली सी दौड़ गयी| उनका तेज़ परवाह उनकी गरिमा गा रहा था| दर्शन के अभिलाषी वहां नदी में पत्तों पे जलते हुए दिए बहा रहे थे, मेरे मन में भी ऐसा करने की अभिलाषा जगी और इसलिए मैं अपने छोटे भाई के साथ दीया खरीदने पास की छोटी- छोटी दुकानों की और चली गयी| वहां जाके एक से पूछा एक दीया चाहिए| दुकानदार ने बड़ी लंबी सी मुस्कराहट के साथ हमारा पहले अभिनन्दन किया और कहा " क्यों नहीं आइये आइये | मैंने पूछा भाई कितने का दे रहे हो ये बताओ ? उसने कहा " १० रुपये का मात्र | दाम ठीक लगे तो मैंने भी हामी भर दी और कहा लाओ एक दीया दे दो| मुझे दीया पकड़ाते ही दुकानदार ने मंत्र उचारण शुरू कर दिए | मैं और मेरा भाई उसका चेहरा देख रहे थे की आखिर एक दीया ही तो माँगा था, ये मंत्र कहाँ से आ गए|
कुछ देर बाद उसने मुझसे मेरे दादाजी का नाम पूछा| मैंने भी बता दिया “स्वर्गीय श्रीमान सुन्दर लाल शर्मा” फिर उसने मेरे पिताजी का नाम पूछा | मैंने फिर बता दिया “श्रीमान महेश शर्मा” ऐसा करते करते उस महान पंडित ने मुझसे मेरे गोत्र मेरे कुल तक का ब्यौरा ले डाला| फिर भी मैं शांति पूर्वक सबका सही सही जवाब देती गयी| आखिरकार मुझे इसका अंत भी तो देखना था| जब सारे सवाल जवाब महाशय के हो गए तो कहने लगे " हाँ बच्चे अब जो इच्छा हो वही भेट दे सकते हो | मैंने पूछा" किस बात की भेट मैंने तो आपसे बस एक दीया ही माँगा था आपने तो पुरे प्रवचन सुना दिए| एक अज़ीब सी भूल भुलिया की दुनिया चल रही थी वहां, अंत में मैंने तो कोई दीया नहीं ख़रीदा| सच्चे दिल से माँ गंगा को प्रणाम किया और आगे बढ़ लिए| आगे देखा तो कोई पूरा का पूरा परिवार एक गाये के बछड़े की पूंछ ही पकडे खड़ा है| ये देखके तो और भी हैरानी हुई पता किया तो जाना ऐसा करके ये सभी स्वर्ग में जाने के अधिकारी हो जायेंगे| ये देखके आखिर क्यों नहीं सोचना पड़ेगा की अभी मृत्यु ने कदम रखा नहीं और सभी को नरक स्वर्ग की चिंता है ? इस तरह की गतिविधयां हैरत में भी डाल देती हैं, और सोचने पर मज़बूर कर देती हैं क्या सचमे कोई भगवान् है या सिर्फ मानव की बनाई हुई एक कोरी कल्पना है जिसे सभीने अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए अपना रखा है| इनसब सवालों ने मेरे दिमाग को कई दिनों से झंझोड़ के भी रखा हुआ था| कोई कुछ बताता है, तो कोई कुछ| ऐसे करते -करते कुछ दिन बीत गए……
में किसी काम से बाजार निकली थी लौटते समय एक मंदिर के सामने कई पुलिस वाले और लोगों की भीड़ देखी | मैं भी जानने के लिए वहां खड़ी हो गयी और एक से पूछा भाई क्या हुआ है ? तब उसने बोला मंदिर में चोरी हो गयी है | वहां खड़े लोगों के बीच में अपनी अपनी चर्चा चल रही है कोई कहे रहा है बताओ जी क्या जमाना आ गया है लोग अब भगवान को भी नहीं छोड़ते | मेरे मन में विचार आया की वैसे भी लोग भगवान को छोड़ते ही कब हैं यहाँ चोरी हुई तो कहीं उनके नाम पर धंधा कर रहे हैं तो कोई सियासत| पर एक और ये भी ख्याल आया की जो भगवान अपने गहने भी नहीं बचा पाया वो हमारी क्या रक्षा करेगा ? पर कहते हैं तुम्हारे भीतर ही ईश्वर है खोजो तो मिलेगा मेरे भीतर के सवाल को तभी उस ईश्वर ने सुन लिया और जल्द ही जवाब भी मिला | जवाब मिला स्वामी रामकृष्ण जी से|
घर लौटने के बाद में स्वामी रामकृष्ण की किताब पढ़ रही थी उसमें स्वामी रामकृष्ण और केशेव चंद्र का संवाद चल रहा था| श्री रामकृष्ण और केशव चन्द्र सेन संवाद से ये तब की बात है जब केशव चन्द्र सेन जी बहुत बीमार थे और दर्द से पीड़ित थे उन्हें किसी बहुत पीड़ा देने वाली घम्बीर बिमारी ने पकड़ रखा था | पहले ये जानना भी जरुरी है की ये केशव चन्द्र जी हैं कौन ? केशव चन्द्र जी एक बहुत बड़े धार्मिक उपदेशक एवं समाज सुधारक थे | तथा ब्रह्मसमाज के सदस्य भी थे | यहाँ संवाद मेरे सवाल का सटीक एवं उच्चित उत्तर प्रतीत हुआ इसलिए यहाँ संवाद में आपके लिए भी यहाँ दे रही हूँ आप भी आनंद लो (श्री रामकृष्ण केशव के प्रति ) :- ब्रह्मज्ञानी गण इतनी महिमा वर्णन क्यों करते हैं ? " हे ईश्वर तुमने चन्द्र बनाया , सूर्य बनाया , नक्षत्र बनाये, इतनी बताओं की क्या जरुरत है ? बहुत लोग बाग़ को देखते ही प्रशंसा करते हैं , कितने लोग मालिक को मिलना चाहते हैं ? बाग़ बड़ा है की बाबू बड़े हैं ? " शराब पी लेने पर फिर कलवार की दूकान पर कितनी मदिरा है , उस हिसाब से मुझे क्या प्रयोजन ? मेरा काम तो एक बोतल से हो जाता है | " नरेंद्र को जब मिला था तो उससे नहीं पूछा था की तेरे बाप का नाम क्या है या तेरे बाप कितने घर हैं ? (नरेंद्र= स्वामी विवेकानंद) जानते हो , क्या है ? मनुष्य निज ऐश्वर्या का अदार करता है, इसलिए सोचता है की ईश्वर भी ऐश्वर्या का आदर करते हैं | सोचता है की उनके ऐश्वर्या की प्रशंसा करने से वो भी प्रसन होंगे | शम्भू ने कहा था :- ऐसा आर्शीवाद दो की ये ऐश्वर्या उनके चरण कमल में देकर मर सकूँ | मैंने उससे कहा " ये तुम्हारे लिए ही ऐशवर्या है तुम उन्हें क्या दोगे ? उनके लिए तो ये सब लकड़ी मिटटी है | जब विष्णु मंदिर का सारा सोना चोरी चला गया था तब सेजूबाबू और मैं राधाकांत बाबू को देखने गए थे | सेजूबाबू बोले ," हर परे ! हो रे भगवान ! तुम्हारी कुछ योग्यता नहीं | तुम्हारे शरीर से समस्त गहने ले गया, और तुम कुछ नहीं कर सके | मैंने उससे कहा यहाँ तुम्हारी कैसी बात ? तुम जिन्हे गहना गहना कह रहे हो वहां उनके लिए मिटटी के ढेले हैं | लक्ष्मी जिनकी शक्ति है , वे तुम्हारे थोड़े से रुपये चुराए तो नहीं जा रहे हैं, क्या यही लिए रहते हैं ? ऐसी बातें नहीं किया करते | " ईश्वर का ऐश्वर्या के वश में हैं ? वे भक्ति के वश में हैं |वे क्या चाहते हैं ? रुपया नहीं | वह तो भाव , प्रेम , भक्ति, वैराग्य इत्यादि चाहते हैं | जिसका जैसा भाव होता है वह ईश्वर को वैसा ही देखता है | तमोगुणी भक्त माँ बकरा कहती है तो वह बलि देता है | रजोगुणी भक्त नाना व्यंजन भात इत्यादि बनाके देता है | सत्वगुनी भक्त की पूजा में आडम्बर नहीं होता | उसकी पूजा का लोगों को पता भी नहीं लगता| फूल नहीं है तो बिल्व पत्र , गंगा जल से ही पूजा कर लेता है | मीठे खिले या बताशा देकर भी ( देवता का संध्या का भोजन ) "शीतल" दे देता है| और हे तिगुड़ातीत भक्त| उनका बालक का सा स्वाभाव होता है | ईश्वर नाम करना ही है उनकी पूजा| केवल उनका नाम |
यहाँ संवाद मेरे सवालों के उठते हुए जवार भाटा को शांत कर गया| सभी सवालों के चाहे वो पूजा अर्चना को लेके हों या भगवान् की छबि को लेके| जो जैसा देखता है वो वैसा ही भगवान् की कल्पना कर लेता है| शक्ति तो है पर उसकी महिमा अनन्त गहरी है, तब सच में ये लगता है ये जो सर्वोपरि ईश्वर हैं बड़े मज़ाकिया भी होने चाहिए|
( रूचि शर्मा)
